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मोदी जैसा कोई नहीं !!!

ये कहानी है 21वीं सदी के उस सूरमा की जिसने राजनैतिक पटल पर अपने आपको ऐसे उभारा जिससे देश ही नहीं विदेशों में भी लोग उनके इस अंदाज के मुरीद हो गए। जी हां हम बात कर रहे हैं नरेंद्र दामोदरदास मोदी की। नरेंद्र दामोदर दास मोदी का जन्म तत्कालीन बोम्बे राज्य के महेसाना जिले स्थित वडनगर में हीराबेन मोदी और दामोदरदास मूलचंद मोदी के मध्यम वर्गीय परिवार में हुआ। नरेंद्र समयानुसार धीरे-धीरे बड़े हुए, घर की आर्थिक स्थिति ठीक न होने की वजह से मोदी बेहद ही कम उम्र की आयु में रेलवे स्टेशन पर चाय बेचने में अपने पिता का हाथ बँटाने लगे। इतना ही नहीं भारत पाकिस्तान के बीच हुए दूसरे युद्ध के दौरान उन्होंने रेलवे स्टेशनों पर सफर कर रहे भीरतीय सैनिकों की मदद भी की।


किसी ने इस चीज की कल्पना भी नहीं की होगी कि जो आवाज रेल की पटरियों पर धूप छांव में चाय-चाय के रुप में गूंजती थी, एक दिन उस आवाज का समूचा देश कायल हो जाएगा। कुदरत ने समय के साथ करवट ली, इसके साथ ही नरेन्द्र मोदी अपनी विशिष्ट जीवन शैली के लिये समूचे राजनीतिक हलकों में जाने जाने लगे। 2014 में गुजरात के मुख्यमंत्री के पद को छोड़ कर जब मोदी ने देश के प्रधानमंत्री के लिए चुनावी रण में छलांग लगाई तो देश की जनता ने उनका खुल कर स्वागत किया। मुझे 2014 के लोकसभा चुनाव का वो दौर याद है जब समूचे भारत वर्ष में मोदी-मोदी के स्वर गूंज रहे थे। पूरे देश को मोदी लहर ने अपने आगोश में ले लिया था। उस दरम्यान मोदी ने पूरे देश में व्यापक स्तर पर चुनावी प्रचार कर लोगों के मन में अपनी पैठ जमा ली। देश की बुजुर्ग पीढ़ी से लेकर युवा पीढ़ी ने भाजपा को बड़े पैमाने पर जनादेश दिया, और उसके बाद जो चुनावी नतीजे आए वो बिलकुल कल्पना के अनकूल थे। 545 लोकसभा सीटों में से भारतीय जनता पार्टी ने 282 सीटों पर अपना परचम लहराया। वहीं कांग्रेस महज 44 सीटों पर सिमट कर रह गई। देश की जनता ने कांग्रेस पार्टी को नकारते हुए नया इतिहास रचा। और इसी के साथ नरेंद्र दामोदरदास मोदी ने भारत के 15वें प्रधानमंत्री के रुप में शपथ ली। मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद एक नए भारत वर्ष का आगाज हुआ। मोदी ने लगातार एक बाद एक सकारात्मक फैसले लिए, चाहे फिर वो अंर्तराष्ट्रीय पटल पर देश को नई पहचान दिलाना हो या फिर देश में विकास को विकास की राह पर सरपट दौड़ाना हो। अब भारत एक नए दौर में प्रवेश कर चुका था। मोदी सरकार की अगुवाई में भारतीय सैना ने पाकिस्तान सरीखे देश में घुसकर सर्जिकल स्ट्राइक और डोकलाम विवाद पर चीन को लाल आंख दिखाकर समूचे विश्व को बता दिया कि ये अब कांग्रेस के दौर का भारत नहीं रहा। अब अंर्तराष्ट्रीय पटल पर बराबरी की बात होती है, फिर चाहे वो चीन, रुस, इजराइल या फिर अमेरिका क्यों न हो। सैन्य शक्ति से लेकर कूटनीतिक मामलों में भारत अब बराबरी के तराजू में समय लगातार बदल रहा था, और देश को लेकर मोदी सरकार की रणनीति भी। केंद्र सरकार ने देश में लगातार बड़ रहे भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के लिए 8 नवंबर 2016 को नोटबंदी (विमुद्री करण) का ऐतिहासिक फैसला लिया। इस फैसले से कालाबजारी करने वालों के उपर ऐसी गाज गिरी कि जिसका कोई सानी नहीं। हालांकि इस फैसले से देश के आम और सरीफ लोगों को काफी कठनाईयों का सामना करना पड़ा, इतना ही नहीं खबरें ये भी आई कि नोटबंदी के चलते तकरीबन 125 लोगों की मौत हो गई। इनमें ज्यादातर मौतें बेटी की शादी टूटने की वजह पिता की खुदखुशी और बुजुर्गों को समय पर इलाज न मिलने के कारण हुईं।


सभी राजनैतिक विपक्षी दल सरकार को घेरने में जुट गए। अब सरकार एक कठिन दौर से गुजर रही थी। विपक्षी पार्टीयों के तमाम आरोपों के बावजूद इस फैसले का जनता ने खुल कर सर्मथन किया इस बात से भी गुरेज नहीं किया जा सकता। सरकार की और से लगातार एक बाद एक नोटबंदी में सुधार के फैसले लिए जाने लगे, लेकिन बैंक में तैनात भ्रष्ट अफसरों की वजह नोटबंदी का कोई खास असर नहीं दिखा। नोटबंदी का फैसला जमीनी तौर पर फेल जरुर साबित हुआ लेकिन जनता समझ रही थी, कि फैसले के पीछे सरकार की नीयत बुरी नहीं है। इसका अंदाजा तब हुआ जब उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में प्रदेश की जनता ने मोदी सरकार को भारी मतों के साथ बहुमत दिया। और इसके साथ ही गोवा, पंजाब सरीखे राज्यों के विधानसभा चुनाव के नतीजों ने विपक्ष के गाल पर तमाचा जड़ते हुए ये साबित कर दिया कि मोदी जैसा कोई नहीं। नोटबंदी जैसे ऐतिहासिक फैसले की सराहना अंर्तराष्ट्रीय पटल पर जमकर हुई इस बात से भी इंकार नहीं किया जाता। मोदी जैसा कोई नहीं जैसे स्वरों की सुगबुगाहट विदेशों में भी दिखाई दे रही थी।


मोदी की एक्शन पारी यहीं खत्म नहीं हुई इसकी बानगी एक बार और तब देखने को मिली जब मोदी सरकार ने आधी रात को संसद में एक देश एक कर की नीति को लागू कर दिया। हालांकि इस फैसले में विपक्ष की भी सहमति थी लेकिन अंदर खाने कहीं न कहीं विरोध की ज्वलंत आग जल रही थी। एक देश, एक कर की नीति के लागू होते ही देश की अर्थव्यवस्था पर खतरे के बादल मडराने लगे। और कुछ दिनों में एक रिर्पोट जारी होती है, जिसमें देश की अर्थव्यवस्था को काफी नुकसान पहुंचने की बात आई। अर्थव्यवस्था की चरमराहट की एक वजह नोटबंदी को भी बताया गया, जो कि काफी हद तक सही भी था। अर्थव्यवस्था का एक दौर ऐसा भी आया जब देश की जीडीपी दर 5.7% तक चली गई। नोटबंदी और जीएसटी जैसे फैसलों ने व्यापार पर बुरा असर डाला इस बात से गुरेज नहीं किया जा सकता। सरकार को काफी आलोचनाओं का सामना करना पड़ा। लेकिन प्रधानमंत्री मोदी ऐसे कठिन वक्त में झुके नहीं, और लगातार संघर्श जारी रखा। मोदी के उस संर्घष का ही परिणाम है जो देश की अर्थव्यवस्था को पटरी पर दुबारा लेकर आए। लेकिन हालत अभी भी ठीक नहीं थे। लेकिन देश की जनता खासकर मध्यम वर्ग के व्यापारी सरकार से खासा नराज दिखे।


इसकी बानगी गुजरात के विधानसभा चुनाव में देखने को मिली। गुजरात में पिछले लंबे अरसे से भाजपा का शासन रहा है। हर बार गुजरात की जनता ने मोदी पर भरोसा जताया है। इस बार भी जताया लेकिन इस बार मोदी सरकार को महज 99 सीटों पर ही संतोष करना पड़ा। वहीं देश के नक्शे से विलुप्त होती कांग्रेस को भविष्य की राजनीति में उम्मीद की किरण दिखाई दी। मेरे हिसाब से मोदी सरकार को ये पहला झटका लगा है। अब मोदी सरकार इसे कितना संजीदगी से लेती है ये गौर करने वाली बात होगी। बहराल देश के मानचित्र पर एक नजर डाली जाए तो आपको भगवा ही भगवा दिखाई देगा। इसे देश की जनता के प्रति नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता नहीं तो और क्या कहा जाए। अगर देश की मौजूदा राजनीति और 2019 के राजनैतिक गणित को समझा जाए तो ये कहने में कोई संकोच नहीं की फिलाल 21वीं सदी के महानायक मोदी ही हैं।

अनुज अवस्थी, नोएडा

पैसों की खनक पर संविधान की डगर…

एक लंबे अरसे से विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र यानि की भारत के बारे में बहुत कुछ सुनता और पड़ता आ रहा हूं। जैसे-जैसे बड़ा हो रहा हूं तैसे-तैसे देश के हालात और परिस्थितियों को टटोल कर जानेने की कोशिश कर रहा हूं, कि ये देश आखिर खड़ा कहां है। बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर द्वारा निर्मित संविधान में तो ये देश लोकतांत्रिक, धर्म निरपेक्ष, समान्य रुप से सबको न्याय देने वाला है, लेकिन असल में शायद ही ऐसा कोई दिन जाता होगा जिस दिन इस संविधान की धज्जियां न उड़ती हों। इस भारतवर्ष में धर्म निरपेक्षता दूर-दूर तक नहीं दिखाई देती और समानता के नाम पर न्याय तो जैसे आवारा और बांझ हो चला है।


पैसे की खनक पर चुटकी बजाते ही निर्दोष को जेल और दोषी को बेल मिल जाती है। किसी नेता के एक इशारे पर इस देश में एक समुदाय के लोग दूसरे समुदाय पर कुत्ते के माफिक भौंकने लगते हैं। मामला शांत होने पर हम सविंधान की दुहाई देकर कहने लगते हैं कि संविधान सर्वोपरि है। अरे इस देश के नागरिको, दिनों दिन क्यों अपनी संविधान की आत्मा को कुचलते जा रहे हो। फाड़ फेको ऐसे आइन को जिसकी यहां कोई कद्र नहीं। जला डालो इसके धर्मनिरपेक्षता और समान रुप से हक देने वाले पन्नों को। आग लगा दो ऐसे न्यायतत्र में जिसमें सिर्फ गरीबों और दबे कुचले लोगों के लिए ही सजा का प्रावधान हो। हमें नहीं चाहिए ऐसे हक जो हमारे हक में ही न हों।


बाबा साहेब ने आइन की रचना इसलिए की थी ताकि इसके माध्यम से हम इस भारतवर्ष को महान और शक्तिशाली बना सकें, मगर यहां पर तो संविधान को ही नपुंसक बना दिया। इन रईसों और सत्ताधारियों ने नोटो तले हमारे संविधान की चिता जला डाली। कहने को तो ये लोकतांत्रिक व्यवस्था के आगे बाध्य हैं, लेकिन असल में अपनी मर्जी के मालिक जैसे चाहते हैं वैसे इस देश को चलाते हैं।


अनुज अवस्थी, नोएडा

अयोध्या की बदौलत…

6 दिसंबर का जिक्र जब भी कभी होता है तो यह तारीख उस विध्वंसक वाक्ये की ओर नजर और स्मृति को केंद्रित करने हेतु कहीं ना कहीं विवस कर ही देती है जिसने भारतवर्ष के सियासी इतिहास को उलट-पुलट कर रख दिया । 6 दिसंबर 1992 वही दिनांक है जिसने देश के सौहार्दपूर्ण ताने-बाने को तितर-बितर कर दिया तथा यह भी साबित किया कि देश के सत्तानसिनों के मगज में अगर राजनीतिक महत्वकांक्षा अपनी पैठ बना ले तो वह किसी भी हद तक जाने तथा किसी भी नियंत्रण रेखा को रौंदने हेतु मजबुर कर ही देती है चाहें वो रेखा कानुनी हो या फिर कोई और किंतु बाबरी विध्वंस केवल धार्मिक सौहार्द को बिगाड़ने का कारण ही नहीं बना बल्कि इसने और भी कई अप्रत्यासित बदलाव किये ।


इस विध्वंस ने जहां भाजपा के हिंदुत्व से सुसज्जित राजनीति को चमकाने का कार्य किया तो वहीं उस कालचक्र के पहिये को भी उस तेज गति से घुमाया कि देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस जिसने देश के स्वतंत्रता में अहम भूमिका अदा की तथा उसके साथ-साथ भारत में कई दशकों तक शासन किया उसी पार्टी को अर्स से फर्स तक के दर्शन भी कराये जो की इस पार्टी के लिये असामान्य सा था । 2014 में हुये लोकसभा चुनाव में दिल्ली की राजगद्दी से हाथ धोने के साथ-साथ कांग्रेस के सफाये का सिलसिला कुछ यूं चला की एक किले सी मजबुत तथा ऐतिहासिक महत्व रखने वाली पार्टी ना केवल पांच राज्यों में सिमट कर रह गई अपितु उस हश्र का भी सामना हुआ जिसमें उसे नेता प्रतिपक्ष तक की सीट भी गवानी पड़ी । वहीं इसके ठीक विपरीत भाजपा को केंद्र की कुर्सी के साथ-साथ 18 राज्यों में सत्ता का स्वाद चखने का लम्हा भी प्रदान किया ।


जिस आडवाणी ने उपप्रधानमंत्री के बाद पूर्ण प्रधानमंत्री बनने का ख्वाब संजोया इत्तेफाक से उसे चकनाचुर करने का शुभारंभ भी उसी व्यक्तित्व (मोदी) द्वारा हुआ जिसने सोमनाथ से लेकर अयोध्या की यात्रा में आडवाणी के सारथी की भुमिका निभाई और वर्तमान में उस व्यक्तित्व का नाम आज देश के प्रधानमंत्री के रूप में प्रधानमंत्री कार्यालय के नामपट्ट की शोभा बढ़ा रहा है । 1992 के बाद 2002 में हुये दंगों ने दो धर्मविशेषों के मन में मोदी को एक प्रखर सनातनी नेता के रूप की प्रतिमा स्थापित की तथा देश की राजनीति में नरेंद्र मोदी को एक ऐसी छवि भी प्रदान की जिसके समक्ष बाकी सभी दिग्गज धुमिल से नजर आने लगे । इसके साथ ही मुरली मनोहर जोशी , आडवाणी तथा अन्य को मुख्यधारा की राजनीति को त्याग कर आपराधीक मुकदमें का सामना करना पड़ रहा है । अगर आज देश के सभी राजनीतिक शीर्ष पदों पर नजर दौड़ायें तो तमाम जगह भाजपा कब्जा जमा चुकी है जो की उसका सबसे बड़ा सपना था ।


पर इन सब में एक बात और निकल के आई की जिस मुस्लिम ध्रुवीकरण का साथ पाकर कांग्रेस देश में सरकार बनाती रही उस ध्रुवीकरण का जवाब भाजपा ने भी हिन्दु ध्रुवीकरण कर देश में सरकार बना कर दिया तो देखा जाय तो फर्क तनिक मात्र भी नही है दोनों में जो ठगने का कार्य कांग्रेस द्वारा भूत में हुआ वह वर्तमान में भी जारी है लेकिन चेहरे और निज़ाम बदल चुके हैं परन्तु इस स्थिति को हम आशचर्यजनक नहीं कह सकते क्योंकि देश में राजनेता होने का मायने ही यही है की वादा कर और भूल जा लेकिन इससे किसी को फर्क नहीं पड़ना चाहिये क्योंकि उपरोक्त सभी बातें इस बात को नाममात्र भी प्रमाणित नहीं करती की पार्टीयों द्वारा तथा देश के राजाओं , राजनेताओं द्वारा भारत में मत हेतु तनिक भी ध्रुवीकरण जैसी अवस्था को उत्पन्न किया जाता है क्योंकि उपरी सभी बातें काल्पनिक हैं । और अगर उपरोक्त सभी सभी बातों को कल्पना से तनिक भी परे माना गया तो यह घोर पाप होगा ।

अनुज अवस्थी, नोएडा